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Gandhi never won the nobel peace prize, despite being nominated five times.

 
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Tiger

ये थे भारत के दुर्दांत ठगों के 3 पक्के उसूल

क्या मैं एक शानदार पति और जानदार दोस्त नहीं रहा हूं? क्या मैंने अपने समाज, अपनी कौम से धोखा किया है? कौन सा रिवाज मैंने नहीं पूरा किया है? कौन है वो आदमी जो आमिर अली के नाम पर बट्टा लगा रहा है? जिसने भी मेरे सम्मान पर उंगली उठाई है, वो बचेगा नहीं. जो नाम मैंने कमाया है, उसे हासिल करने के लिए लोग तरसते हैं.
ये बुलंद आवाज निकली थी आमिर अली की जबान से. ब्रिटिश राज के कोर्ट में. आमिर पर मुकदमा चल रहा था 700 लोगों की हत्या का. आमिर ने कहा था कि अगर जेल नहीं आया होता, तो हज़ार लोगों को तो मार ही दिया होता.

पर अपने डिफेन्स में कही आमिर की सारी बातें सही हैं. वो एक बेहद चालाक और मजबूत आदमी. अपनी बात का पक्का. इरादों में चट्टान. जन्मजात नेता. और एक वहशी हत्यारा. पर हत्या को वो हत्या नहीं मानता था. ये उसके लिए मां काली का आशीर्वाद था. ये वही चीज थी, जिसे आज के ज़माने में लोग \'खुद को खोजने\' के नाम से जानते हैं. दस साल की उम्र में ही आमिर ने खुद को खोज लिया था.
आमिर अली एक ठग था. ब्रिटिश राज का सबसे मशहूर ठग. शायद ठगी के 600 सालों का सबसे मशहूर.

600 साल के इतिहास में ठगों ने हर साल 50 हज़ार से 2 लाख तक लोगों को मारा था

बारहवीं शताब्दी से भारत में मुस्लिम शासक जम चुके थे. अब वो यहीं के हो के रह गए थे. उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच व्यापार भी काफी बढ़ने लगा था. लोग इधर-उधर आने-जाने लगे थे. उसी दौरान मध्य प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र तक के इलाकों में ठग पैदा हुए. बाद में ये देश के हर भाग तक फ़ैल गए. ये ठग धर्म से हिन्दू और मुसलमान दोनों होते थे. पर ये धर्म सिर्फ उनके घर पर था. उनके प्रोफेशनल जीवन में ठगी ही धर्म होता था.

ठग मां काली को मानते थे. उनका मानना था कि मां काली ने ठगों को हत्या के लिए ही पैदा किया है. कहानी के मुताबिक धरती पर अनैतिकता बहुत ज्यादा बढ़ गई थी. काली ने ठगों को धरती पर भेजा ऐसे लोगों को मारने के लिए. हाथ में रुमाल देकर. इसी रुमाल से लोगों का गला घोंट दिया जाता था. ठगों ने सबको मार दिया. फिर काली ने इनको कहा कि तुम्हें धरती पर ही रहना है. ऐसे लोग आते रहेंगे. और आपको मारते रहना है. ये लोग ठगी पर जाने से पहले मां काली का इशारा खोजते थे. कहीं मंदिर के पास गधा दिख गया या बिल्ली दिख गई तो इसे शकुन माना जाता था. अगर शकुन ना हुआ तो ये लोग आगे नहीं बढ़ते थे. अंग्रेजों के एक अनुमान के मुताबिक ठग हर साल 50 हज़ार से लेकर 2 लाख तक लोगों को मार देते थे. हालांकि ये अनुमान अंग्रेजों ने बहुत बढ़ा-चढ़ाकर भी लगाया होगा ताकि जनता में अंग्रेजी राज के प्रति सहानुभूति बनी रहे. क्योंकि ठग तो वो लोग भी थे!

पूरा माफिया जैसा प्लान कर के काम होता था

इनके काम करने का तरीका बहुत ही खतरनाक था. ये झुंड में चलते. धनी यात्रियों की तरह. उस वक़्त ठगों के डर से कोई भी अकेले यात्रा नहीं करता था. हमेशा ग्रुप में चलते. ठग अपने लोगों से धनी लोगों के बारे में पता करते. फिर उनके ग्रुप में शामिल हो जाते. बड़े प्यार से बातें करते. सबके दिल का हाल लेते. भरोसा बनाते. लोग इन पर भरोसा कर अपने बच्चों को इनके पास छोड़ देते. अपने सुख-दुःख शेयर कर लेते. फिर जब सारे लोग अलसाये से हो जाते, ठग एक-एक इंसान के पीछे लग जाते. जब वो इंसान दुनिया से बेखबर, अपने साथियों की तरफ से निःशंक, अपनी यात्रा और अपने प्लान से खुश रहता, उसी वक़्त ये ठग उनके कंठ पर रुमाल लपेट के गला घोंट देते. गला घोंटने से पहले एक सिग्नल दिया जाता. चलो पान खाते हैं. बुलावा आ गया. मौसम का मिजाज कैसा है. बहुत सारे यात्री ठगों के इस सिग्नल की कहानियां सुन चुके रहते थे. वो थर्रा जाते. पर बच नहीं पाते. मारने के बाद सारे लोगों को दफना दिया जाता था. पर एक दिक्कत आती थी कि दबी लाश फूल जाती और सियार खोद-खोद के खाने लगते. इसके लिए दफ़नाने से पहले लाश का पेट फाड़ दिया जाता था.

ठगी के कुछ उसूल भी थे:

1. इसमें औरत हो या बच्चा, किसी को भी नहीं छोड़ा जाता था. किसी के नाम पर फरमान निकल गया, तो फिर उसे मरना ही है. चाहे उसके पास पैसा हो या नहीं.

2. पर किसी भी औरत से छेड़खानी या रेप नहीं होता था. क्योंकि ये ठगी के उसूलों से बाहर था.

3. अगर किसी ठग की पहचान पब्लिक में हो गई, तो साथी ही उसे मार देते थे. क्योंकि पहचान छुपा के रखना बहुत जरूरी था.

ठगों में अलग-अलग पोस्ट भी होते थे

ठगों में सबके काम बंटे हुए थे. हर कोई गला घोंटने का काम नहीं कर सकता था. इसके लिए खुद को साबित करना पड़ता था. क्योंकि शिकार हमेशा कमजोर नहीं होता था. और रुमाल से गला घोंटने के लिए ताकत के साथ चालाकी भी चाहिए होती थी. तो ये पोस्ट थे ठगों के:

1. सोथा किसी यात्री ग्रुप से बात करने जाते थे. ये बड़े चालाक होते थे. हर जगह की भाषा-संस्कृति, खान-पान से परिचित होते थे. आज भी ऐसे लोग मिल जाते हैं जो बात-बात में अपनी रिश्तेदारी निकाल लेते हैं.

2. भुट्टोटे होते थे गला घोंटने वाले. सीनियर मोस्ट ठग. सिग्नल मिलते ही पीछे से जाकर गला घोंट देते. दो असिस्टेंट आ जाते शिकार के हाथ-पैर पकड़ने के लिए.

3. बेल्हा कब्र खोदते थे. जब ठगी का प्लान हो जाता, तो जगह से कुछ दूरी पर जाकर फटाफट कब्र खोद देते थे.

4. अंत में लुघाई आते थे. ये लाशों को दफ़न करने के एक्सपर्ट थे. पूरे काम के दौरान बाकी यात्रियों के साथ आराम फरमा रहे होते. क़त्ल होते ही हरकत में आ जाते.

☝🏽☝🏽आमिर खान और अमिताभ बच्चन की फिल्म आ रही है Thugs of Hindostan जो आमिर अली की कहानी पर बनी है. ये कहानी फिलिप मिडोज टेलर की लिखी किताब The Confessions of a Thug पर आधारित है. इस कहानी के बारे में मैं सैम आपको अगले भाग में बताऊंगा...

 
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Sam's Son

""जितना सत्य जीवन है उतनी ही सत्य मृत्यु है"

माइकल जैक्सन डेड सौ साल जीना चाहता था! किसी के साथ हाथ मिलाने से पहले दस्ताने पहनता था! लोगों के बीच में जाने से पहले मुंह पर मास्क लगाता था !उसकी देखरेख करने के लिए उसने अपने घर पर 12 डॉक्टर्स नियुक्त किए हुए थे !

जो उसके सर के बाल से लेकर पांव के नाखून तक की जांच प्रतिदिन किया करते थे! उसका खाना लैबोरेट्री में चेक होने के बाद उसे खिलाया जाता था! उसको व्यायाम करवाने के लिए 15 लोगों को रखा हुआ था! माइकल जैकसन अश्वेत था उसने 1987 में प्लास्टिक सर्जरी करवा कर अपनी त्वचा को गोरा बनवा लिया था!

अपने काले मां-बाप और काले दोस्तों को भी छोड़ दिया गोरा होने के बाद उसने गोरे मां-बाप को किराए पर लिया! और अपने दोस्त भी गोरे बनाए शादी भी गोरी औरतों के साथ की!

नवम्बर 15 को माइकल ने अपनी नर्स डेबी रो से विवाह किया, जिसने प्रिंस माइकल जैक्सन जूनियर (1997) तथा पेरिस माइकल केथरीन (3 अपैल 1998) को जन्म दिया।

18 मई 1995 में किंग ऑफ पॉप ने रॉक के शहजादे एल्विस प्रेस्ली की बेटी लिसा प्रेस्ली से शादी कर ली। एमटीवी वीडियो म्यूजिक अवॉर्ड्स में इस जोड़ी के ऑनस्टेज किस ने बहुत सुर्खियाँ बटोरी! हालाँकि यह जोडी सिर्फ दो साल तक ही साथ रह पाई और 18 जून 1996 में माइकल और लिसा ने तलाक ले लिया।

वो डेढ़ सौ साल तक जीने के लक्ष्य को लेकर चल रहा था! हमेशा ऑक्सीजन वाले बेड पर सोता था,उसने अपने लिए अंगदान करने वाले डोनर भी तैयार कर रखे थे! जिन्हें वह खर्चा देता था,ताकि समय आने पर उसे किडनी, फेफड़े, आंखें या किसी भी शरीर के अन्य अंग की जरूरत पड़ने पर वह आकर दे दे।

उसको लगता था वह पैसे और अपने रसूख की बदौलत मौत को भी चकमा दे सकता है लेकिन वह गलत साबित हुआ 25 जून 2009 को उसके दिल की धड़कन रुकने लगी उसके घर पर 12 डॉक्टर की मौजूदगी मैं हालत काबू में नहीं आए, सारे शहर के डाक्टर उसके घर पर जमा हो गए वह भी उसे नहीं बचा पाए।

उसने 25 साल तक बिना डॉक्टर से पूछे कुछ नहीं खाया! अंत समय में उसकी हालत बहुत खराब हो गई थी 50 साल तक आते-आते वह पतन के करीब ही पहुंच गया था! लगभग उसने बच्चों का यौन शोषण किया वह घटिया हरकतों पर उतर आया था! और 25 जून 2009 को वह इस दुनिया से चला गया जिसने जिसने अपने लिए डेढ़ सौ साल जीने इंतजाम कर रखा था!उसका इंतजाम धरा का धरा रह गया!

जब उसकी बॉडी का पोस्टमार्टम हुआ तो डॉक्टर ने बताया! कि उसका शरीर हड्डियों का ढांचा बन चुका था! उसका सिर गंजा था उसकी पसलियां कंधे हड्डियां टूट चुके थे! उसके शरीर पर अनगिनत सुई के निशान थे प्लास्टिक सर्जरी के कारण होने वाले दर्द से छुटकारा पाने के लिए एंटीबायोटिक वाले दर्जनों इंजेक्शन उसे दिन में लेने पड़ते थे!

माइकल जैक्सन की अंतिम यात्रा को 2.5 अरब लोगो ने लाइव देखा था। यह अब तक की सबसे ज़्यादा देखे जाने वाली लाइव ब्रॉडकास्ट हैं।

माइकल जैक्सन की मृत्यु के दिन यानी 25 जून 2009 को 3:15 PM पर, Wikipedia,Twitter और AOL\'s instant messenger यह सभी क्रैश हो गए थे।

उसकी मौत की खबर का पता चलता है गूगल पर 8 लाख लोगों ने माइकल जैकसन को सर्च किया! ज्यादा सर्च होने के कारण गूगल पर सबसे बड़ा ट्रैफिक जाम हुआ था! और गूगल क्रैश हो गया ढाई घंटे तक गूगल काम नहीं कर पाया!

मौत को चकमा देने की सोचने वाले हमेशा मौत से चकमा खा ही जाते हैं! सार यही है,बनावटी दुनिया के बनावटी लोग कुदरती मौत की बजाय बनावटी मौत ही मरते हैं!

क्यूँ करते हो गुरुर अपने चार दिन के ठाठ पर,
मुठ्ठी भी खाली रहेगी जब पहुँचोगे घाट पर॥

 
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Heart catcher

बराक ओबामा के बारे में रोचक तथ्य

1. केन्या की स्वाहिली भाषा में Brack Obama का मतलब है ऐसा शख्स जो कि सौभाग्यशाली है.

2. क्या आपको पता है कि हर पांचवा अमेरिकी ओबामा को मुस्लिम समझता है.

3. अगर ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं होते तो वो आर्किटेक्ट होते। हालांकि इस वजह से कई बार इंटरव्यू के दौरान सफाई भी देनी पड़ी है.

4. ओबामा को बच्चों से काफी प्यार है। यह प्यार इस हद तक है कि वो अपनी मीटिंग के बीच में बच्चों को गोद में उठा लेने से परहेज नहीं करते हैं.

5. ओबामा कहते हैं कि मेरी सबसे बुरी आदत लगातार अपने Blackberry Phone को चेक करते रहना है.

6. जब ओबामा हावर्ड में पढ़ रहे थे तो उन्होंने ब्लैक पिन-अप कैलेंडर में अपनी तस्वीर छपवाने के लिए आवेदन किया लेकिन आल फीमेल कमेटी ने उन्हें नकार दिया.

7. ओबामा Apple का Laptop इस्तेमाल करना ही पसंद करते हैं.

8. ओबामा लेफ्टी हैं यानी वो अपने बाएं हाथ से काम करते हैं। ओबामा America के छठवें ऐसे राष्ट्रपति हैं तो अपने बाएं हाथ से ही सारे काम करते हैं.

9. Brack Obama जब Indonesia में रहते थे तब उन्होंने एक बंदर का पाला था और इसे TATA नाम दिया था। उन्हें ताश के पत्ते खेलना और घसीटने का खेल पसंद है.

10. ओबामा ने जो कहा, वह किया यह भी साबित किया, कि अमेरिकी राष्ट्रपति कोई एलियन नहीं है। वह भी आम इंसान है जो परिवार के साथ छुट्टी मनाता है. पसंदीदा संगीत बजने पर पत्नी मिशेल को बांहों में भरकर नाचता है. सबके सामने चूमता है.

11. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा अपने कॉलेज के दिनों से ही चेन स्मोकर रहे हैं. तब लोगों ने उनका निक नेम \'बराक ओगांजा\' रख दिया था.

12. बराक ओबामा ऐसे एकलौते राष्ट्रपति हैं जिन्होंने White House के भीतर बीयर बनाई है.

13. आपको यह जानकर भी हैरानी हो सकती है कि वह बचपन में कभी DOG और SNAKE का मीट भी खाते थे, लेकिन आज उन्हें COFFEE से भी परहेज है.

14. बराक ओबामा Harry potter के दीवाने हैं और वो इस सीरीज का हर उपन्यास कई बार पढ़ चुके हैं.

15. Brack Obama के पसंदीदा कलाकारों में Pablo Picasso का नाम सबसे ऊपर आता है.

16. अगर आपको लगता होगा कि ओबामा सिर्फ अंग्रेजी जानते हैं तो यह आपकी गलतफहमी है. ओबामा अंग्रेजी के अलावा स्पैनिश और इंडोनेशियन भाषा भी बहुत ही अच्छे से बोल लेते हैं और लिख भी लेते हैं.

17. ओबामा अगर किसी खेल को अपनी जिंदगी में लाना चाहते हैं तो, वो है बॉक्सिंग. ओबामा बॉक्सिंग को बेहद पसंद करते हैं,उनके पास विश्व प्रसिद्ध Muhammad Ali के ग्लव्स है.

18. ओबामा Icecream बेहद पसंद करते हैं। जब वो कम उम्र के थे तो आईस्क्रिम के लिए वो आईस्क्रिम की दुकान में पार्ट टाईम जॉब करने लगे.

19. जिन 3 लोगों का बराक ओबामा सबसे ज्यादा गुणगान करते हैं वे Mahatma Gandhi, Abraham Lincoln तथा Martin Luther King हैं.

20. 2008 में राष्ट्रपति के चुनाव के बाद अपनी पत्नी Michelle Obama को सिगरेट छोड़ने का वादा किया था, जिसे ओबामा ने निभाया. 2010 के बाद तो ओबामा सिगरेट को हाथ भी नहीं लगाते हैं.

 
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B P S R

*एक फोन की आग में जलेंगे सैमसंग के 1 लाख करोड़ रुपये!*

सैमसंग गैलेक्सी नोट 7 का प्रोडक्शन आधिकारिक तौर पर रोक दिया गया है और इससे शायद कंपनी को इतिहास का सबसे बड़ा घाटा लगा है. सीएनबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी की कुल वैल्यू में 18 बिलियन डॉलर (लगभग 1 लाख 20 हजार करोड़ रु.) की कमी आई है. और एक दिन में उसके शेयर्स 8 फीसदी गिरे.

आखिर कहां हो गई गलती-

सैमसंग ने नोट 7 लॉन्च करने में जल्दी कर दी. इस प्रोडक्ट की उतनी टेस्टिंग नहीं हुई जितनी होनी चाहिए थी. एक बार कंपनी ने गैलेक्सी नोट 7 वापस लेकर दूसरे गैलेक्सी नोट 7s मॉडल के 2.5 मिलियन हैंडसेट्स बनाए और वो भी फेल. आखिर इतनी क्या जल्दी थी. कंपनी को कम से कम दूसरे प्रोडक्ट की पूरी टेस्टिंग तो कर लेनी थी, लेकिन शायद आईफोन से टक्कर लेने के लिए कंपनी ने ये गलत कदम उठा लिया जो इतना नुकसानदेह साबित हुआ.

बंद हुआ या नहीं?

सैमसंग ने नोट 7 सीरीज के सभी मॉडल्स का प्रोडक्शन रोक दिया है. ऐसे में ये कहना मुश्किल है कि ये पूरी तरह से बंद हो गया है या नहीं, लेकिन फिलहाल सैमसंग के भविष्य के लिए ये जरूरी है कि वो नोट 7 का मोह छोड़ दे. कंपनी को अब अपने मिड रेंज सेग्मेंट के लिए कुछ करना चाहिए जहां अभी भी बात बन सकती है. लो बजट रेंज चीनी स्मार्टफोन्स की वजह से नुकसान झेल रही है, हाई बजट रेंज में नोट 7 ने कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन सैमसंग कंपनी अभी भी मिड-रेंज में अपनी बात बना सकती है.

पहले भी कंपनियों ने की है ये गलतियां-

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसी कंपनी के किसी एक प्रोडक्ट ने करोड़ों का नुकसान करवाया हो और उसमें छोटी सी गलती की वजह से कंपनी की इमेज खराब हुई हो. एप्पल, नोकिया, माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों की एक छोटी सी गलती ने उनके ब्रैंड को बहुत नुकसान पहुंचाया है. चलिए जानते हैं थोड़ी सी हिस्ट्री, ये हैं 10 सबसे खराब टेक प्रोडक्ट्स हैं. इन्हें आप सैमसंग नोट 7 का भाई-बंधु भी कह सकते हैं.

*एप्पल-*
एप्पल के जितने सफल प्रोडक्ट्स हैं उससे कहीं ज्यादा फ्लॉप हैं.

*1. The Apple Lisa*
स्टीव जॉब्स की बेटी लीसा के नाम पर बनाया गया ये कम्प्यूटर स्टीव जॉब्स के कार्यकाल में लॉन्च हुए सबसे फ्लॉप प्रोडक्ट्स में से एक रहा है. लीसा प्रोजेक्ट के फेल होने के बाद स्टीव जॉब्स को इस प्रोजेक्ट से हटाकर मैकिंटोश के प्रोजेक्ट में भेज दिया गया था. एप्पल के लीसा की कीमत 1983 में 9,995$ थी जो 2016 के हिसाब से लगभग 6.5 लाख रुपए होती. इतने महंगे सिस्टम का फेल होना एप्पल के लिए बहुत हानिकारक साबित हुआ था. जॉब्स को उनके अड़ियल स्वभाव के लिए और लीजा प्रोडक्ट पर टिके रहने के लिए अपनी ही बनाई कंपनी से निकाल तक दिया गया. उन्हें निकालने की वजह भी जॉन स्कली बने थे जिन्हें जॉब्स ने खुद कंपनी में नौकरी दी थी.

*2. Macintosh TV*
एप्पल टीवी के आने से पहले 1993 में मैकिंटोश (Macintosh TV) टीवी लॉन्च किया गया था. कंपनी का ये मैक टीवी सबसे फ्लॉप प्रोडक्ट्स में से एक है. ये टीवी अक्टूबर 1993 में लॉन्च हुआ था और फरवरी 1994 में इसे बंद कर दिया गया. एप्पल के इस टीवी के सिर्फ 10000 सेट्स बनाए गए थे. एक रिपोर्ट के मुताबिक इसका स्टॉक खत्म नहीं हो पाया था.

*3. Apple III*
एप्पल के कुछ सबसे फ्लॉप प्रोडक्ट्स में से एक है एप्पल III कम्प्यूटर. ये पहला कम्प्यूटर था जिसकी डिजाइनिंग में स्टीव वॉजनिएक ने कोई मदद नहीं की थी. ये प्रोडक्ट 1980 में लॉन्च किया गया था और इसे 1981 में बंद कर दिया गया. इसे बंद करने का कारण था इसका डिजाइन. ये कम्प्यूटर साइज में बड़ा था और इसका मदरबोर्ड कम काम में ही काफी गर्म हो जाता था. इसके कारण मेमोरी चिप अपने सॉकेट से बाहर आ जाती थी और सिस्टम क्रैश हो जाता था.

*4. Macintosh Portable*
एप्पल का पहला बैटरी पावर पोर्टेबल कम्प्यूटर भी कंपनी के फेल हुए प्रोडक्ट्स में से एक है. 20 सितंबर 1989 को लॉन्च हुए इस प्रोडक्ट को क्रिटिक्स रिव्यू में तो अच्छा रिस्पॉन्स मिला था, लेकिन यूजर रिस्पॉन्स काफी कम रहा था. इस कम्प्यूटर में माउस की जगह ट्रैक बॉल का इस्तेमाल किया गया था. की-बोर्ड और छोटी स्क्रीन के साथ इस कम्प्यूटर में बैटरी का इस्तेमाल हुआ था. इसे अगर पहले के जमाने का पोर्टेबल लैपटॉप कहा जाए तो भी गलत नहीं होगा.

*माइक्रोसॉफ्ट-*

माइक्रोसॉफ्ट की टेक हिस्ट्री में कई बड़ी गलतियां दर्ज की गई हैं. इनमें से एक तो नोकिया को खरीदना माना जाता है मल्टी मिलियन डॉलर की ये डील ना ही कंपनी को फायदा दे पाई और ना ही डूबती हुई नोकिया की हिस्ट्री बदल पाई. तो कौन से थे माइक्रोसॉफ्ट के फ्लॉप प्रोडक्ट्स.

*5. Windows 8*
विंडोज 8 में टाइल यूजर इंटरफेस के साथ माइक्रोसॉफ्ट ने इस प्रोडक्ट में स्टार्ट बटन खत्म कर दिया था. ये ही शायद सबसे बड़ी गलती रही जो विंडोज का ये नया मॉडल यूजर्स को लुभाने में नाकाम रहा था. लोगों ने नए ऑपरेटिंग सिस्टम को जल्दी से अपग्रेड तो कर लिया था, लेकिन उसके बाद लोगों को ये पसंद नहीं आया. अब देखा जाए तो ये एक तरह से माइक्रोसॉफ्ट का नया इनोवेशन था जो गलती साबित हो गई.

*6. Windows Mobile*
माइक्रोसॉफ्ट को सबसे बड़ा लॉस डेस्कटॉप वर्जन को मोबाइल में कनवर्ट करने की कोशिश में हुआ है. पहले नोकिया के साथ साझेदारी में विंडोज मोबाइल बनाना और उसके बाद नोकिया को खरीदकर माइक्रोसॉफ्ट मोबाइल के नाम से विंडोज फोन बेचना. नोकिया लुमिया सीरीज के कुछ ही फोन्स हिट हो पाए थे और बाकी सभी नकार दिए गए थे. ऐसे में विंडोज मोबाइल को माइक्रोसॉफ्ट ब्रैंड मोबाइल बनाना दूसरी बड़ी गलती साबित हुई.

*7. Microsoft Windows Millennium (2000)*
इसे विंडोज का सबसे खराब वर्जन कहा जाए तो गलत नहीं होगा. इस ऑपरेटिंग सिस्टम को विंडोज 98 का नया और अपग्रेडेड वर्जन बताया गया था और ये सिस्टम लोगों को जरूरत से ज्यादा परेशान करता था. इस वर्जन में लोगों को इंस्टालेशन से लेकर वर्किंग तक हर चीज में गड़बड़ लगती थी. इसे अपडेट करके रीस्टोर फीचर के साथ विंडोज XP लॉन्च किया गया जो था तो बहुत बेस्ट लेकिन उस ओएस में वायरस फाइल्स को भी रीस्टोर कर दिया जाता था. इसलिए वायरस के मामले में XP को थोड़े कम नंबर मिलते हैं. हालांकि, मिलेनियम को खत्म कर XP लॉन्च करना उस समय माइक्रोसॉफ्ट के लिए अच्छा फैसला था.

*गूगल-*

गूगल भी अपनी लिस्ट में पीछे नहीं है. गूगल ग्लास से लेकर वेव और गूगल आन्सर तक कई ऐसे प्रोडक्ट्स हैं जो इस लिस्ट में शामिल हैं. गूगल की अपने आप में एक टॉप 10 लिस्ट बन सकती है.

*8. Google Glass*
गूगल ग्लास अपने आप में एक महत्वकांक्षी लेकिन फेल प्रोडक्ट है. लाखों डॉलर का ये प्रोडक्ट अपने समय से काफी आगे का जरूर है, लेकिन कुछ खास कारणों से ये प्रोडक्ट फेल हुआ. सबसे पहले तो सेफ्टी और हेल्थ की दिक्कतें इस प्रोडक्ट के साथ सामने आई थीं. लोगों की आंखों में समस्या आनी लगी थी और ये ग्लास कोई खास फीचर भी नहीं देता था. अभी भी ये प्रोडक्ट बीटा स्टेज पर है, लेकिन इसमें कितनी संभावना बाकी है ये कहना मुश्किल है.

*9. Google Answers*
अगर आपने नाम नहीं सुना तो आपको बता दूं की ये एक बहुत महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट था जो लोगों के लिए एक पर्सनल अस्सिटेंट टूल था जिसमें लोगों के लिए इंटरनेट सर्चिंग करने की क्षमता थी. ये कुछ-कुछ याहू आन्सर्स की तरह ही था. आप कोई सवाल एक कम्युनिटी में डाल सकते थे और लोग इसका जवाब देते. इसमें लोगों को टॉप जवाब देने पर आपको कुछ फीस भी मिलती थी, लेकिन इंटरनेट खुद में इतना विशाल हो गया कि इस तरह की सर्विस की कोई जरूरत नहीं रही. गूगल ने इस प्रोडक्ट को 2006 में बंद कर दिया था.

*10. Dodgeball*
गूगल ने इस कंपनी को 2005 में खरीदा था और इसके साथ ये लक्ष्य रखा था जिसमें कोई भी यूजर की लोकेशन की मदद से वो अपने बिजनेस पार्टनर, दोस्त और बाकी रिलेटिव्स को ढूंढ सकता था. डॉजबॉल के फाउंडर डेनिस क्राउली को गूगल ने नौकरी भी दे दी थी, लेकिन प्रोडक्ट में कोई बदलाव ना देखते हुए डेनिस ने दो साल के अंदर कंपनी छोड़ दी और फोरस्क्वेयर लॉन्च की. गूगल ने आखिरकार 2009 में इसे बंद कर दिया और 2013 में इसी तरह के फीचर्स के साथ गूगल लैटिट्यूड लॉन्च किया जो फिर से एक फ्लॉप प्रोडक्ट साबित हुआ.

इन कंपनियों ने अपने मामले में बहुत आगे की सोची और यूजर्स के लिए बहुत ही फायदेमंद प्रोडक्ट्स लाने की कोशिश की, लेकिन हुआ ये कि किसी ना किसी छोटी गलती की वजह से इन्हें नुकसान झेलना पड़ा. आप अंदाजा लगा सकते हैं जब दुनियाभर में सर्कुलेशन वाला कोई प्रोडक्ट फेल होता है तो क्या हाल होता होगा कंपनी का.

 
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जब ओवैसी के दादा को पटेल ने जेल में ठूंस दिया था

13 सितम्बर 1948 को भारत में पहली बार इमरजेंसी जैसी स्थिति बनी. ये 1975 की इंदिरा इमरजेंसी से अलग थी. इस दिन भारत के 36 हज़ार सैनिकों ने हैदराबाद में डेरा डाला. 13 से लेकर 17 सितम्बर तक भयानक क़त्ल-ए-आम हुआ. कहा गया कि हजारों लोगों को लाइन में खड़ा कर गोली मार दी गई. आर्मी ने इसे \'ऑपरेशन पोलो\' कहा था. कुछ हिस्से में ये \'ऑपरेशन कैटरपिलर\' भी कहा गया. सरदार पटेल ने दुनिया को बताया कि ये \'पुलिस एक्शन\' था.

भारत की आज़ादी के बाद कई रियासतें अपना अलग देश चाहती थीं. पर भारत सरकार इस बात के लिए तैयार नहीं थी. क्योंकि ये संभव नहीं था. कोई भी तर्क उनकी बात के पक्ष में नहीं जाता था. नतीजन प्यार से या फटकार से, सबको भारत के साथ मिलना पड़ा. पर कुछ रियासतों ने भारत को चुनौती देने का मन बना लिया था. इनमें से एक रियासत थी हैदराबाद रियासत. यहां पर समरकंद से आये आसफजाह की वंशावली चलती थी. ये लोग मुगलों की तरफ से इस रियासत के गवर्नर थे. औरंगजेब के बाद इनका राज हो गया था यहां. इनको निज़ाम कहते थे. तो 1948 में निज़ाम उस्मान अली खान आसफजाह सातवें उस प्रजा पर राज करते थे, जिसमें ज्यादातर हिंदू थे. निज़ाम उस वक़्त दुनिया के सबसे धनी लोगों में से एक थे.

निज़ाम का सपना था कि अपना एक अलग देश हो. इसके लिए अपनी आर्मी के अलावा उन्होंने एक अलग आर्मी बना रखी थी. जिसमें मुस्लिम समुदाय के लोग थे. इनको रजाकार कहते थे. इसके पहले निज़ाम ब्रिटिश सरकार के पास भी जा चुके थे. कि कॉमनवेल्थ के अधीन इनका अपना देश हो. पर माउंटबेटन ने मना कर दिया था. A. G. Noorani ने लिखा है कि नेहरू बातचीत से मामला सुलझाना चाहते थे. पर सरदार पटेल के पास बात करने के लिए धैर्य नहीं था.

एग्रीमेंट टूटते गए, देश से लेकर अमेरिका तक बात पहुंची

अभी तक हैदराबाद से एग्रीमेंट हुआ था कि आप अपना राज्य चलाइए अभी. बस भारत सरकार आपके फॉरेन रिलेशन देखेगी. साथ ही पाकिस्तान से आपको कोई सम्बन्ध नहीं रखना है. पर हैदराबाद रियासत ने पाक को करोड़ों रुपये भी दिए थे. इस नाते दोनों पक्ष एक-दूसरे पर एग्रीमेंट तोड़ने का इल्जाम लगाते रहते. रियासत ने आरोप लगाया कि भारत सरकार उनको चारों तरफ से घेर रही है. सरकार ने कहा कि आप हमारी करेंसी तक तो यूज नहीं कर रहे. पाकिस्तान से हथियार मंगवा रहे हैं. रजाकार की सेना बना रहे हैं. क्या चाहते हैं?
माउंटबेटन ने जून 1948 में फिर एक एग्रीमेंट रखा. इसके मुताबिक सब चलता रहेगा वैसे ही. निज़ाम हेड ऑफ़ स्टेट रहेंगे. पर धीरे-धीरे जनता का फैसला लाया जायेगा. भारत सरकार तैयार हो गई. पर निज़ाम तैयार नहीं हुए. उनको पूर्ण स्वराज चाहिए था. इसके लिए उन्होंने यूएन और अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन की भी मदद मांगी. पर मिली नहीं. उन लोगों ने कुछ नहीं बोला.

ओवैसी के दादाजी बने रजाकारों के मुखिया, बनाना चाहते थे इस्लामिक देश

हैदराबाद में पहले से ही कम्युनल टेंशन था. इसी के साथ तेलंगाना को लेकर विरोध था. उसी वक़्त मुसलमानों का एक ग्रुप बना था MIM जिसके मुखिया थे नवाब बहादुर यार जंग. इनके मरने के बाद मुखिया बने कासिम रिजवी, जो कि अभी के हैदराबाद के ओवैसी भाइयों के दादा जी हैं. कासिम रजाकारों के नेता थे. इन लोगों का उद्देश्य था इस्लामिक राज्य बनाना. ये डेमोक्रेसी को नहीं मानते थे. इन लोगों ने आतंक फैला दिया. जो भी इनके खिलाफ था, इनका दुश्मन था. कम्युनिस्ट और मुसलमान जो इनसे अलग थे, वो भी इनके टारगेट थे. मेन टारगेट थे हिन्दू. नतीजन हजारों लोगों को मारा जाने लगा. औरतों का रेप हुआ. इनको लगा कि ऐसा करने से इनका महान राज्य बन जायेगा.

भारत सरकार का धैर्य टूट गया. सरदार पटेल ने सेना की टुकड़ी हैदराबाद में भेज दी. सेना के पहुंचने के बाद 5 दिन तक जबरदस्त लड़ाई हुई. पुलिस एक्शन बताने के चलते दुनिया के किसी और देश ने हाथ नहीं डाला. मिलिट्री एक्शन कहते ही दुनिया के बाकी देश भारत पर इल्जाम लगा देते कि भारत ने किसी दूसरे देश पर हमला कर दिया है. रजाकारों को पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया. कासिम को जेल में डाल दिया गया. इनके ऑफिस दारुस्सलाम को फायर स्टेशन बना दिया गया. MIM के नेताओं को पाकिस्तान भेज दिया गया या पब्लिक में निकलने से रोक दिया गया. बाद में कासिम को जेल से निकलने पर दो दिन का टाइम दिया गया पाकिस्तान जाने के लिए. MIM को एकदम बंद कर दिया गया. ये वही पार्टी है, जिसे अब ओवैसी भाई AIMIM के नाम से चलाते हैं.

आरोप लगे थे इंडियन आर्मी पर, 65 साल बाद आई रिपोर्ट

इस लड़ाई पर कई आरोप लगे. इल्जाम था कि सेना और सिविल के लोगों ने हैदराबाद में लूटपाट और रेप की इन्तहा कर दी थी. पर इन सारी बातों को बाहर नहीं आने दिया गया. इसके लिए सुन्दर लाल कमिटी भी बनाई गई. पर इसकी रिपोर्ट बाहर आने में 65 साल लग गए! 2013 में ये रिपोर्ट बाहर आई. कई लोगों के मुताबिक इस लड़ाई में 10-40 हज़ार लोग मारे गए थे. कुछ कहते हैं कि दो लाख के करीब लोग मरे थे!
रिपोर्ट ने साफ़-साफ़ हैदराबाद स्टेट में हुए लूट-पाट और रेप का ब्योरा दिया है. हैदराबाद का भारत में विलय हो तो गया पर इसके लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ी. ये सोचना बड़ा मुश्किल हो जाता है कि क्या होता, तो क्या होता. पर जो लोग एकता और अखंडता की बात करते हैं, उनको तो कम-से-कम ये नहीं ही करना चाहिए था. लड़ाई में मरना-मारना तो अलग बात होती है. पर लड़ाई के अलावा अपनी कुंठा निकालना किसी भी देश के इतिहास को दागी बना देता है.

 
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Sam's Son

मुंह पर गोबर लगाने से इस खूबसूरत औरत से बन जाओगे!

गुजरात गो सेवा और गोचर विकास बोर्ड ने कहा है कि चेहरे पर गाय का गोबर और गोमूत्र लगाने से क्लियोपैट्रा जैसा निखार आएगा. कौन थी क्लियोपैट्रा और वो अपनी खूबसूरती के लिए क्या करती थी, पढ़िए.

\'उसकी खूबसूरती दैवीय थी. उसे देखना सुख और रोमांच से भर देता था.\'

ये बात कही थी रोम के इतिहासकार कैसिअस डियो ने, क्लियोपैट्रा के मरने के 200 साल बाद.

जब वो 14 साल की थी, उसके पिता राजा टोलेमी की मौत हो गई. क्लियोपैट्रा और उसके छोटे भाई पर इजिप्ट पर राज करने का भार आ गया. पर क्लियोपैट्रा वो औरत नहीं थी, जो ये नहीं करना चाहती. इजिप्ट पर राज करना उसका सपना था. रिवाजों के मुताबिक उसके छोटे भाई से उसकी शादी करा दी गई. लेकिन क्लियोपैट्रा राजपाट को बांटने के मूड में नहीं थी. उसने डिक्लेअर कर दिया कि वो इजिप्ट पर अकेले राज करेगी. क्लियोपैट्रा इजिप्ट की इकलौती रानी बन गई. उसके नाम के सिक्के चलने लगे. लेकिन ये राह इतनी आसान नहीं होने वाली थी.
लोग आदी नहीं थे एक औरत को राज करते हुए देखने के. जो ग्रीक लोग क्लियोपैट्रा के पिता का साथ देते थे, अब उसके बेटे का साथ देने लगे. क्लियोपैट्रा से उसका राज छीन लिया गया. अपने बेटे के साथ उसे इजिप्ट छोड़ बाहर भागना पड़ा. क्लियोपैट्रा का भाई टोलेमी अब इजिप्ट पर राज कर रहा था.

उस समय जूलियस सीजर रोम का राजा था. इकलौता नहीं, रोम पर एक तिकड़ी का राज था. जूलियस सीजर के साथ पॉम्पे राज करता था. सीजर और पॉम्पे के संबंध अच्छे नहीं थे. रोम के अंदर दोनों में लड़ाई चल रही थी. टोलेमी को लगा अगर वो सीजर को खुश कर देगा तो मजा आ जाएगा. उसने पॉम्पे का सर कटवा कर सीजर के क़दमों में धर दिया. सीजर भैया आग बबूला. असल में पॉम्पे सीजर का दामाद भी था. वो पॉम्पे को हराना तो चाहता था, मारना नहीं चाहता था.
एक मिथक ये भी है कि उस दिन सीजर अपने सिंहासन पर बैठा था. क्लियोपैट्रा एक गद्दे में लिपटकर आई. और सैनिकों ने गद्दा सीजर के सामने खोल दिया. गोल घूमती हुई क्लियोपैट्रा सीजर के क़दमों पर रुकी. बला की खूबसूरत लड़की, भरी जवानी में, देखे तो आंखों से मार दे, सीजर के क़दमों में पड़ी थी. उस दिन से अपनी मौत तक सीजर ने क्लियोपैट्रा से प्रेम किया. जब सीजर को उसके दुश्मनों ने साजिश कर मार डाला, सीजर का ख़ास एंटनी राजा बना. क्लियोपैट्रा और एंटनी करीब आ गए. और एक दूसरे के प्रेम में पड़ गए.

1963 में जब क्लियोपैट्रा पर फिल्म बनी, एलिज़ाबेथ टेलर ने उसका किरदार किया. एलिज़बेथ के तीखे नैन-नक्श देख लगता था क्लियोपैट्रा ज़मीन पर उतर आई है. आने वाले कई सालों तक क्लियोपैट्रा के नाम पर लोगों की कल्पनाओं में एलिज़ाबेथ टेलर ही बस गई.
कहते हैं क्लियोपैट्रा गधी के दूध में शहद और बादाम का तेल मिलाकर नहाती थी. बालों में गुनगुने तेलों का मिक्सचर लगाती थी और चेहरे पर सोने का मास्क लगाकर सोती थी. लेकिन गोमूत्र का जिक्र कभी नहीं आया. मिथक के तौर पर भी नहीं.
क्लियोपैट्रा के बारे में जो बात हम भूल जाते हैं, वो ये कि एक खूबसूरत चेहरे से ज्यादा एक खूबसूरत दिमाग थी वो. एक पुरुषवादी समाज में 14 की उम्र से अपनी जगह बनाने के लिए लड़ना. और आखिरी सांस तक शान से जीना.

क्लियोपैट्रा का शरीर भरा हुआ था. नाक लंबी थी. आज बॉलीवुड में होती तो प्रोड्यूसर वजन घटाने को कहते. पुराने सिक्कों में देखें तो सोचेंगे कि ये तो किसी भी आम औरत की तरह है. लेकिन लिखने वालों ने लिखा है कि उसकी आवाज लोगों पर जादू कर देती थी. उसके ज्ञान और जानकारी के आगे बड़े-बड़े पंडित पसर जाते थे. जैसे इत्र की शीशी खोलने पर उसकी खुशबू बिखर जाती है, क्लियोपैट्रा की महज मौजूदगी में ही कुछ ऐसा था कि आस-पास के लोग सम्मोहित होने लगते थे. उसकी जीभ किसी वाद्य यंत्र के तार की तरह थी. बदलकर कोई भी भाषा बोल सकती थी. और हर भाषा उतनी ही मधुर.

सीजर और एंटनी दुनिया के सबसे बड़े राजाओं में रहे हैं. यूं ही किसी की शक्ल पर ऐसे मोहित नहीं हो सकते कि सब कुछ लुटा दें. क्लियोपैट्रा में कुछ ऐसा था, जो उसके शरीर से बढ़कर था. सीजर और एंटनी की ज़िन्दगी में बहुत सी औरतें आई थीं. पर किसी का वैसा जिक्र नहीं आया जैसा क्लियोपैट्रा का आता है. क्लियोपैट्रा ने सिर्फ इन दो राजाओं को ही नहीं, साल दर साल लेखकों और कवियों को अपने मोह से बांधा है.

क्लियोपैट्रा जैसी सुंदर ही उसकी मौत थी. सुंदर और मौत दो ऐसे शब्द हैं, जो शायद एक साथ कभी नहीं आते. लेकिन क्लियोपैट्रा की मौत में एक अलग ही तरह का काव्य दिखता है.

क्लियोपैट्रा और एंटनी साथ में ऑगस्टस सीजर के खिलाफ लड़ रहे थे. एंटनी युद्ध के मैदान में था. तभी एंटनी की सेना की एक टुकड़ी ने उसे धोखा दे दिया. एंटनी को लगा क्लियोपैट्रा ने अपने सैनिक वापस बुला लिए हैं. क्लियोपैट्रा युद्ध में एंटनी को हारता देख घबरा गई. उसने स्तन पर डसने के लिए ज़हरीला सांप छोड़ दिया. और एंटनी को संदेश भिजवाया अपनी मौत का. एंटनी ने क्लियोपैट्रा की मौत की खबर सुनकर खुद को तलवार भोंक ली. लेकिन उसका खून जम गया, बहा नहीं. इधर क्लियोपैट्रा ने कहा वो एंटनी को देखना चाहती है. एंटनी को जैसे ही ये खबर मिली, वो क्लियोपैट्रा के पास भागा. क्लियोपैट्रा के चेंबर में वो खिड़की से घुसा, रस्सी के सहारे चढ़कर. जख्मी एंटनी अब मरने लगा था. और ऊपर आकर उसने अपनी आखिरी सांस क्लियोपैट्रा की बांहों में ली, शराब पीते हुए. सांप से कटवा चुकी क्लियोपैट्रा भी वहीं मर गई.

 
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Sam's Son

अगर आपको भी काम करने से परहेज है और आप काम से जी चुराते हैं तो इस खबर को पढ़कर आपके चेहरे पर मुस्कान आ जाएगी.

एक अध्ययन की मानें तो फिजिकल वर्क से जी चुराने वाले लोग, तुलनात्मक रूप से ज्यादा समझदार और बुद्धिमान होते हैं. ऐसे में अगर लोग अब तक कामचोरी के ताने दिया करते थे तो अब आप उन्हें बता सकते हैं कि बुद्धिमान लोग फीजिकल वर्क कम करते हैं.

अब आपको देर तक सोफे पर लेटे हुए टीवी देखने या यूं ही पड़े रहने के लिए बहाने बनाने की जरूरत नहीं. अब जब भी कोई अापसे कहे कि आप आलसी या कामचोर हैं तो फौरन उन्हें बताएं के आप आलसी इसलिए है क्योंकि आप बुद्धिमान हैं.

एक रिसर्च के मुताबिक, जो लोग आलसी होते हैं या शारीरिक तौर पर कम काम करते हैं, असल में उनका दिमाग तेज होता है. अध्ययन के अनुसार, जो लोग ज्यादा समय तक सोचते हैं वे फिजिकल वर्क कम कर पाते है.

एक सर्वे के अनुसार, तेज दिमाग वाले लोग फिजिकली बहुत एक्टिव नहीं होते हैं. बावजूद इसके वो बोर नहीं होते हैं क्योंकि वे हर समय कुछ न कुछ सोचते रहते हैं. उनके लिए उनके विचार और उनकी सोच बहुत मायने रखती है और वे उन्हीं में बिजी रहते हैं. रिसर्च में पाया गया है कि शारीरिक रूप से ज्यादा काम करने वाले लोग "नॉन-थिंकर" होते हैं और वो अपने विचारों पर भी ध्यान नहीं देते.

"जर्नल ऑफ हेल्थ साइकोलॉजी" में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, संपूर्ण विकास के लिए सोचना और शारीरिक काम करना दोनो ही जरूरी हैं. हालांकि शारीरिक रूप से ज्यादा काम करने वाले लोग जल्दी बोर हो जाते हैं जिससे उनके दिमाग पर भी बुरा असर पड़ता है.

अध्ययन में गौर करने वाली एक बात और कही गई है कि जो लोग ज्यादा बुद्धिमान हैं लेकिन काम से जी चुराते हैं, वे भी एक समय के बाद बोर होने लगते हैं और उनमें भी निगेटिविटी आने लगती है. ऐसे में अगर सोचने के साथ ही काम करने की आदत भी डेवलप कर ली जाए तो लाइफस्टाइल को और बेहतर बनाया जा सकता है.

 
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Sam's Son

You can ask Siri how long you can be outside before your skin gets sunburned by asking for the "UV index"

 
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इस हकीम को पहले स्वामी भक्त कहा गया और फिर विद्रोही


सुबह होते ही हवेली का दर खुलता. दीवानखाना में मरीज जमा होने लगते. वहां एक तख़्त हकीम साहब से सज जाता. मरीज आते और हकीम साहब चेहरा देखते ही बता देते कि उसे क्या मर्ज है. मर्ज की इतनी शिनाख्त की उनकी नजरों से बच नहीं पाता. कौन हकीम था ये जो इतनी क़ाबलियत रखता था. कौन है ये हकीम जो मसीहा-ए-हिंद कहलाया. कौन था ये जो इंडियन नेशनल कांग्रेस का प्रेसिडेंट बना. कौन था ये हकीम जिसको आज भुला दिया गया.

इस हकीम का नाम था अजमल खान. इंडिया में यूनानी चिकित्सा का डंका बजाने वाले. उनकी पहचान महज एक यूनानी हकीम की नहीं थी. बल्कि वो लेक्चरर भी रहे और आज़ादी के मतवाले भी. इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने और मुस्लिम लीग से भी जुड़े. असहयोग आंदोलन में भी हिस्सा लिया और खिलाफत मूवमेंट का भी नेतृत्व किया.

हकीम अजमल खान 11 फ़रवरी 1863 को दिल्ली में उस फैमिली में पैदा हुए जो मुग़ल सम्राट बाबर के टाइम भारत आई थी. उनके दादा परदादा मुग़ल बादशाहों की फैमिली का इलाज किया करते थे. उनकी फैमिली में सभी यूनानी हकीम थे. हकीम अजमल खान की पढ़ाई शुरू हुई. कुरान को हिफ्ज़ कर लिया यानी जबानी याद कर लिया. यूनानी डॉक्टरी की पढ़ाई कर डाली. जब उनकी पढ़ाई मुकम्मल हो गई उन्हें 1892 में रामपुर के नवाब का मेन हकीम तैनात कर दिया गया. अपने पुरखों की तरह उनके इलाज में भी बेहद असर था और ऐसा कहा जाता था कि उनके पास कोई जादुई खजाना था, जिसका राज़ केवल वे ही जानते हैं. इलाज करने में इतने माहिर हो गए थे कि यह कहा जाने लगा था, वो सिर्फ मरीज का चेहरा देखकर उसकी बीमारी का पता लगा लेते हैं. तभी तो वो अपने दीवानखान में तख़्त पर बैठे हुए एक दिन में 200 मरीजों को देखकर दवाई दे दिया करते थे.

उनकी खासियत में उनकी जबान की मिठास भी शुमार होती है. कभी भी किसी को कड़वी बात नहीं कही. हां, जब वे किसी पर नाराज होते थे तो मुस्कारते हुए सिर्फ़ इतना ही कहते थे, \'तुम बड़े बेवकूफ हो.\' यूनानी इलाज में माहिर होने के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1907 में उन्हें हाजिम-उल-मुल्क की उपाधि से नवाजा.



ये वजह रही अंग्रेजों के खिलाफ जाने की

इंडियन नेशनल कांग्रेस की वेबसाइट के मुताबिक अजमल खान अभी छिटपुट राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति की तरफ बढ़ ही रहे थे कि 1910 में भारत सरकार यानी अंग्रेज हुकुमत ने हकीमों और वैद्यों की प्रोफेशनल मान्यता को वापस लेने का प्रस्ताव सामने रख दिया. हकीम अजमल खान को लगा कि हुकुमत का यह फैसला भारत के डॉक्टरी सिस्टम को खत्म कर देगा. उन्होंने हकीमों और वैद्यों से सरकार के पेश किए गए बिल के खिलाफ एकजुट होने की अपील की. ये पहला मौका था जब वो अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ खुलकर सामने आए. उसी दौरान इटली ने त्रिपोली पर अटैक कर दिया. त्रिपोली नार्थ लेबनान का बेयरुत के बाद सबसे बड़ा शहर है. अंग्रेजों ने उस तरफ ध्यान नहीं दिया और उदासीन रुख अपनाया. इस पर भारतीय मुसलमानों ने इस पर नाराजगी दिखाई और एकजुट होना शुरू कर दिया. अजमल खान ने खुद को इस आंदोलन में झोंक दिया.

इसी दौरान फर्स्ट वर्ल्ड वॉर शुरू हो गया. और इंडियन पॉलिटिक्स पर विराम लग गया. लेकिन तुर्की के इस वॉर में शामिल होने से हालात बदल गए. बहुत से मुस्लिम लीडरों को गिरफ्तार कर लिया गया. हकीम अजमल खान बहुत से अन्य इंडियंस की तरह वॉर में अंग्रेजी हुकुमत का साथ दे रहे थे. लेकिन मुस्लिम नेताओं की बड़े लेवल पर हुई गिरफ़्तारी ने उनको सरकार का साथ छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया.

1918 में हकीम अजमल खान कांग्रेस में शामिल हो गए. हकीम साहब के पॉलिटिक्स में शामिल होते ही पुश्तैनी घर, जो आज भी बल्लीमारान में शरीफ मंज़िल के नाम से मौजूद है, पॉलिटिक्स का अड्डा बन गया. और हकीम आजादी के दीवाने बनते गए. हकीम साहब की प्लानिंग के मुताबिक 30 मार्च, 1919 को दिल्ली में सबसे बड़ी हड़ताल हुई थी. इस कामयाब बनाने के लिए बाकी नेताओं ने उनकी तारीफ की. आजादी के संघर्ष ने \'स्वामीभक्त\' अजमल खान को \'विद्रोही\' अजमल खान में बदल कर रख दिया. 1920 में उन्होंने अपनी उस उपाधि को ठुकरा दिया, जो अंग्रेज हुकुमत ने दी थी. इस फैसले का भारतीय लोगों सम्मान किया और उनको मसीह-उल-मुल्क (देश को बीमारी से बचाने वाला) की उपाधि से नवाजा.

हकीम साहब की गांधीजी से पहली मुलाकात 1919 में हुई. और वो असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए. 1921 में कांग्रेस का अहमदाबाद में अधिवेशन हुआ. जहां उन्हें इंडियन नेशनल कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया. वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बनने वाले पांचवें मुस्लिम थे. उसी दौरान ख़िलाफ़त मूवमेंट का नेतृत्व भी किया.

अध्यक्ष बनाए जाने पर अहमदाबाद में उन्होंने अपनी स्पीच में कहा, \'असहयोग की भावना पूरे देश में फैली है. इस महान देश में कोई भी सच्चे दिल वाला भारतीय नहीं होगा, जो भले ही देश के सुदूर कोने में हो और जिसने खुशी से स्वराज्य पाने के लिये और जिसने पंजाब और खिलाफत पर अन्यायों का प्रतिकार करने के लिये, कष्टों को ना झेला हो. स्वयं का बलिदान ना दिया हो.\'
असहयोग आंदोलन के वक्त का एक किस्सा उनके बारे में सुनाया जाता है कि एक बार राजा ने अपने महल में अपनी बीमार रानी को दिखाने के लिए हकीम साहब को बुलाया. हकीम अजमल खान जब रानी के कमरे में पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि रानी विदेशी कपड़े पहने हुए थी. पूरा कमरा विदेशी सामान से भरा हुआ था. हकीम साहब ने रानी की नब्ज़ को देखते हुए कहा, \'वक्त बदल रहा है. अब तो आप लोगों को विदेशी कपड़े नहीं पहनने चाहिए. सिर्फ खादी का ह इस्तेमाल करो.\'

रानी ने कहा कि, \'हकीम साहब खादी पहनने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन वह इतनी मोटी और खुरदरी होती है कि जिस्म में गड़ती है.\' यह सुनते ही हकीम साहब ने रानी की नब्ज़ को छोड़ दिया और खड़े होकर कहने लगे, \'फिर तो मैं आपकी नब्ज़ नहीं देख पाऊंगा. जब खादी आपके जिस्म में गड़ती है, तो मेरी उंगली भी आपके हाथ में चुभती होंगी, क्योंकि मैं भी हिन्दुस्तानी हूं. हकीम साहब की बात सुनकर महाराजा बड़े शर्मिंदा हुए. उन्होंने हकीम साहब से माफी माँगते हुए कहा कि अब वे अपने घर में एक भी विदेशी चीज़ नहीं रखेंगे.

अजमल खान ने जहां अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ाया वहीं वे जामिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के संस्थापकों में से एक थे और 1920 में जामिया के चांसलर बने और 1927 तक अपनी मौत होने तक उस पद पर बने रहे. 29 दिसंबर को दिल की बीमारी की वजह से मरीजों को सही करने वाला इस दुनिया से रुखसत हो गया. भारत के बंटवारे के बाद हकीम ख़ान के पौत्र हकीम मुहम्मद नबी ख़ान पाकिस्तान चले गए. हकीम नबी ने हकीम अजमल ख़ान से तिब्ब (औषधि) सीखी और लाहौर में \'दवाखाना हकीम अजमल ख़ान\' बना लिया. जिसकी ब्रांच पूरे पाकिस्तान में हैं.

 
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Sam's Son
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