Shayari (18 in 1 month | sorting by most liked)

*भुलाना और 👉 भूल जाना तो बस एक वहम है दिल ❤ का,*

*भला कौन निकलता है दिल से, एक बार ☝ बस जाने के बाद..*

 
326
 
24 days
 
DDLJ143

अगर हवाओं के रुख मेहरबाँ नहीं होते
तो बुझती आग के तेवर जवाँ नहीं होते
वफा का ज़िक्र चलाया तो हँस के बोले वो
ये फिज़ूल काम हमारे यहाँ नहीं होते

 
178
 
24 days
 
amit 19

आजकल ,ये रस्में मोहब्बत, कुछ इस तरह से अदा हो रही है ,
कभी तुमसे लाखो शिकवे, कभी जिंदगी तुमपे ही फ़ना हो रही हैं ।
😊😊😊😊😊

 
167
 
27 days
 
amit 19

धारा ए तीन सौ सात लगनी चाहिए तेरी निगाहों पर..

यूँ देखना भी कत्ल की कोशिशों में शुमार होता है...😃

 
142
 
10 days
 
Navsad Chariya

थोड़ा सा हम जो हंस हंसा लिए,
लोगों ने अपने हाथ में पत्थर उठा लिए.
फेंके जो हम पर पत्थर लोगों ने बेशुमार,
उन पत्थरों को जोड़कर कुछ घर बना लिए..😓😓😓😌😌

 
127
 
25 days
 
amit 19

ख़त में उसने लिखा था बाकी बातें मिलने पर

मिलने पर नजर झुका ली बोली बाकि बाते खत में..

 
125
 
12 days
 
aaakash

जो दिया खुदा ने उसी में ख़ुश रहना सिख ऐ बंदे....
यू तो चाँद को भी धरा का साथ नसीब नहीं है .....

 
110
 
25 days
 
Abhilekh.......

अब आ गए हैं आप तो आता नहीं है याद; वर्ना कुछ हम को आप से कहना ज़रूर था~

 
105
 
21 days
 
amit 19

वो कह कर चले गये की "कल" से भूल जाना हमे...

हमने भी सालों से "आज" को रोके रखा है...!!

बहुत दिनों की बात है
फिज़ा को याद भी नहीं
ये बात आज की नहीं
बहुत दिनों की बात है

शबाब पर बहार थी
फिज़ा भी ख़ुशगवार थी
ना जाने क्यूँ मचल पड़ा
मैं अपने घर से चल पड़ा

किसी ने मुझको रोक कर
बड़ी अदा से टोक कर
कहा था लौट आईये
मेरी क़सम ना जाईये

पर मुझे ख़बर न थी
माहौल पर नज़र न थी
ना जाने क्यूँ मचल पड़ा
मैं अपने घर से चल पड़ा

मैं शहर से फिर आ गया
ख़याल था कि पा गया
उसे जो मुझसे दूर थी
मगर मेरी ज़रूर थी

और एक हसीन शाम को
मैं चल पड़ा सलाम को
गली का रंग देख कर
नई तरंग देख कर

मुझे बड़ी ख़ुशी हुई
मैं कुछ इसी ख़ुशी में था
किसी ने झांक कर कहा
पराये घर से जाईये

मेरी क़सम न आईये
वही हसीन शाम है
बहार जिसका नाम है
चला हूँ घर को छोड़ कर

न जाने जाऊँगा किधर
कोई नहीं जो टोक कर
कोई नहीं जो रोक कर
कहे कि लौट आईये

मेरी क़सम न जाईये

 
65
 
17 days
 
amit 19
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